कामिनी की कामुक गाथा (भाग 55)

पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे द्वारा फंसा कर लाई गयी, अपने पति की उपेक्षा की शिकार रेखा की दमित कामुक भावनाओं को भड़का कर पहले मैंने और फिर बाद में क्षितिज नें उसके साथ यौन संबंध स्थापित किया। क्षितिज नें पहले उसकी योनि का उद्धार किया फिर उसकी गुदा का रसस्वादन किया। रेखा इस कामक्रीड़ा से बेहद आनंदित हुई और वर्षों से दमित कामेच्छा की तृप्ति प्राप्त की। इसी दौरान अनजाने में मैं अपने परिवार के गंदगी भरे इतिहास के पन्ने खोल बैठी, जिसे सुनकर रेखा और क्षितिज भौंचक्के रह गये। जिन परिस्थितियों से दो चार होती हुई आज की वासना की गुड़िया कामिनी को देखा उन्होंने, तो वे मुझसे घृणा नहीं कर सके, उल्टे मेरी सोच और बिंदास विचारों के आगे नतमस्तक हो उठे। रेखा को अपने जीवन में नया रस भरने का मार्ग सूझ गया। क्षितिज ने अपनी चुदाई से उसके तन में नवजीवन का संचार कर दिया था। उसके अंदर का अपराधबोध हम सब के खुले कामकेली और मेरे विचारों की अभिव्यक्ति से छूमंतर हो गया था। इतने दिनों की सोई वासना की आग को भड़का दिया था। वह बेहद प्रफुल्लित थी लेकिन अब भी थोड़ा बहुत संकोच बचा हुआ था। इसी दौरान बूढ़े हरिया और करीम मिलकर मेरी नग्न देह को भंभोड़ते रहे और मुझे वासना के ज्वाला की तपिश से राहत प्रदान करते रहे। अपनी वृद्धावस्था में भी उन्होंने जिस जोश खरोश और संभोग क्षमता के साथ मेरी नग्न देह को भोगा, वह अविश्वसनीय था, प्रशंसनीय था। वासना का वह सैलाब जब थमा तो रात का नौ बज चुका था। रेखा को डिनर के लिए रुकने हेतु मनाने के साथ ही हमारे मन में एक कुटिल विचार आया। इशारों इशारों में हरिया, करीम और मैं, इस बात से एकमत हो गये कि आज की रात रेखा के लिए यादगार रात बना देंगे, उसके मन के रहे सहे संकोच को भी धो देंगे। अभी तो सिर्फ क्षितिज से चुदी थी, जिस लार टपकाती नजरों से हरिया और करीम रेखा की कामुक, कमनीय, खूबसूरत देह का दीदार कर रहे थे, इतना तो तय था कि रेखा को अभी और झेलना बाकी था। मेरी समझ से जो होने वाला था, रेखा के लिए अच्छा ही था। उसकी सारी शर्म, हया झिझक दूर होनी थी, तभी तो आगे जाकर खुल कर जिंदगी के मजे ले सकेगी। अब आगे –

“रेखा तू जा मेरे बाथरूम में, नहा धो कर तरोताजा हो जा, चुद चुद कर हलकान हो रही होगी। हरिया, आप जाईए हमारे खाने की व्यवस्था कीजिए। खाना विशेष होना चाहिए समझ गये ना। बाकी तुम सब भी चलो जाकर फ्रेश हो जाओ, फिर हम इकट्ठे डिनर टेबल पर मिलते हैं।” कहकर मैं नुच चुद कर बेहाल अपने शिथिल शरीर में शक्ति इकट्ठा कर थरथराते पैरों पर खड़ी हुई और अपने कपड़े पहनने लगी। अलसाए से सभी उठे और फ्रेश होने चले। कुछ समय पहले तक जो लंड शेर बने अकड़ रहे थे, इस वक्त भीगी बिल्ली बने लुल्ली नजर आ रहे थे। इस अवस्था में भी मैं मुस्कुरा उठी। रेखा तुरंत मेरे बाथरूम में घुस गयी। मैं हरिया और करीम के लुल्लियों को हाथ से थपकी देती हुई फुसफुसाई, “सो लो मेरे शेरों, रात को फिर शिकार करना है।” खुशी में मगन, मुस्कुराते हुए हरिया और करीम कमरे से रुखसत हुए। क्षितिज मेरा नादान बच्चा, हमारी कुत्सित योजना से अनजान, अपने कमरे में चला गया तरोताजा होने के लिए। उसके हिसाब से आज की चुदाई का कार्यक्रम का अंत हो गया था।

रात्रि भोजन के लिए करीब दस बजे हम सब खाने की मेज पर उपस्थित हुए। हम सब खुश थे। सबके सब तरोताजा हो कर आये थे। खाना खाते वक्त थोड़ी चुहलबाजी हो रही थी लेकिन रेखा अब भी थोड़ा संकोच कर रही थी। हरिया और करीम जैसे लोगों ने भी रेखा को नग्नावस्था में देख लिया था न। नग्नावस्था में सिर्फ कहां, चुदते देखा था, जिस तरह आनंदमग्न क्षितिज के साथ संभोग में लिप्त थी, यह किसी भी मर्द की हवस को भड़काने के लिए पर्याप्त था और ये तो ठहरे एक नंबर के औरतखोर चुदक्कड़। शायद उसी का प्रभाव रहा हो, सकुचा रही थी बेचारी। खाना खत्म करके यूं ही कुछ देर बैठे बातें करते हुए मैंने पूछ लिया, “क्या हुआ रेखा, ऐसे क्यों चेहरा बना हुआ है तुम्हारा?” मैं बोली।

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही।”

“क्या बस ऐसे ही?”

“इन लोगों ने भी मुझे उस हालत में देख लिया न, उफ्फ्फ्फ मां।” हरिया और करीम की ओर देखते हुए धीमे स्वर में बोली। चेहरा लाल हो उठा यह कहते हुए।

“ओह आंटी, तो क्या हुआ? क्या फर्क पड़ता है?”

“हा हा हा हा, फर्क पड़ता है बेटा। रेखा को फर्क पड़ता है। पहली बार किसी गैर मर्द से चुदी है न, वह भी ऐसे, इतने लोगों के बीच। पगली, ऐसे शरम करोगी तो कैसे चलेगा? यह तो शुरुआत है। आगे आगे देखती जा, खूब मजा करोगी।”

“छि: जंगली कहीं की।” लाज से दोहरी हो उठी।

“हाय मेरी लाड़ोरानी। तू रुक जा आज यहीं, तेरी सारी लाज शरम खतम हो जाएगी।”

“नहीं नहीं, मैं जाऊंगी अब।”

“पागल, देख नहीं रही है रात का ग्यारह बज रहा है। रुक जा न यहीं, मेरे कमरे में सो जाना। वैसे भी कल रविवार है। छुट्टी है। ऑफिस जाने की टेंशन तो है नहीं। सिन्हा जी भी नहीं हैं। क्या चिंता है?”

“हां आंटी, रुक जाईए न।” क्षितिज बोल उठा, उसके आग्रह में रेखा के लिए चाहत स्पष्ट झलक रहा था। अब उसका इनकार कमजोर हो गया।

“ओके बाबा ओके। रुक जाती हूं।”

“यह हुई न बात। चलो अब, काफी रात हो गयी है। सोने चलते हैं।” कहकर मैं उठ खड़ी हुई। रेखा और क्षितिज की मुद्राओं से लग रहा था कि वे अभी सोने के मूड में नहीं हैं।हरिया और करीम के दिमागी हालत भी मुझसे छिपी नहीं थी। एक मूक संदेश मैं उन्हें देकर रेखा को खींचती हुई अपने कमरे में दाखिल हुई।

क्षितिज आशा और शरारत भरी आवाज में बोल पड़ा, “मॉम, यह क्या? मुझे अकेले नींद नहीं आएगी।”

“आ जाएगी नींद, अभी तू अपने कमरे में जा। सोने का प्रयास कर। फिर भी नींद न आये तो आ जाना, मैं लोरी सुना कर सुला दूंगी।” मैं भी शरारत से बोली। हरिया और करीम को पता था क्या करना है, अत: वे चुपचाप चले गये अपने कमरों की ओर।

“रेखा, तू मेरी नाईटी पहन ले।” मैंने अपनी एक नाईटी उसे दे दी। रेखा कुछ अनमनी सी थी। जैसे ही वह मेरे बिस्तर पर आई, मैंने उसे बांहों में भर लिया। “हाय मेरी बन्नो, क्या बात है? इस तरह गुमसुम क्यों है?”

“हट साली शैतान की खाला। ज्यादा अनजान मत बन।” मेरी पकड़ से आजाद होने की कोशिश करती हुई बोली।

मैंने और सख्ती से उसे जकड़ लिया। “समझ गयी मैं।मर्द चाहिए, है ना?”

“तू बड़ी कुत्ती चीज है हरामजादी।”

“हां, वो तो हूं।” कहकर मैं उसे चूमने लगी। मैं अपने बायें हाथ से उसे कस कर दबोच लिया और दायें हाथ से जबर्दस्ती नाईटी के ऊपर से ही उसकी चूचियों को सहलाने लगी। ब्रा नहीं पहनी थी वह। “वाह मेरी रानी, ब्रा नदारद? जरा देखूं तो, पैंटी भी है कि वह भी नदारद?” मेरा हाथ उसकी जांघो के बीच जा पहंचा। “वाह साली, पैंटी भी गायब?” पैंटी भी नहीं पहनी थी वह। तो इसका मतलब चुदने हेतु तैयार। “साली चूत की ढक्कन, नाईटी से केवल बदन ढंक कर आई है, चुदने की पूरी तैयारी के साथ। वाह, मजा आ गया। अब नखरे छोड़ और उतार दे नाईटी भी, मुझसे भी शरम?”

“हट बदमाश।” नखरे करने लगी वह।

“चुप, अब बिल्कुल चुप। चुदवाने की चाह भी और नखरे भी? यही हाल रहा तो मरते रहेगी, कोई मर्द तेरे पास फटकेगा भी नहीं। चुदना है तो खुल के चुद।” कहते हुए जबर्दस्ती उसकी नाईटी को नोच फेंकी मैं। वाऊ, जितनी भी बार रेखा की नग्न देह का दर्शन करती हूं, जल उठती हूं उसकी खूबसूरती पर। आनन फानन मैं भी आदिम युग की नारी में परिवर्तित हो गयी, पूर्णतया नंगी और टूट पड़ी रेखा पर। उसके उन्नत उरोजों को दबाती हुई मुह लगा कर चूसने लगी।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, पागल, उफ्फ्फ्फ जादूगरनी कमीनी।” तड़फड़ा उठी वह उत्तेजना के मारे। मैं उसकी हालत की परवाह किए बगैर उसकी योनि सहलाने लगी जो क्षितिज के लिंग की बेरहम कुटाई से फूल कर कचौरी बन गयी थी। “उफ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मार ही डालोगी क्या?” उस पर वासना का खुमार चढ़ रहा था। मैं रुकी नहीं, उसकी पनिया उठी योनि में उंगली डाल बैठी। “हाय अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, मत कर मत कर हरामजादी, आह्ह्ह्ह्ह्, ऐसा मत कर, उफ्फ्फ्फ ओ्ओ्ओह्ह्ह् ओ्ओ्ओह्ह्ह् झड़ रही्ही्ई्ई्ई्ई्ई हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं मैं।” कहते कहते सचमुच में झड़ने लगी वह। लेकिन मैं भी कम कमीनी थोड़ी न हूं, छोड़ी नहींं उसे। उसके निर्जीव पड़ते शरीर से खेलती रही। मैं 69 के पोजीशन में आ गयी और उसकी योनि चाटने लगी। मेरी योनि ठीक उसके मुह के ऊपर थी। पुनः वह गरम हो गयी और उत्तेजना के मारे मेरे नितंबों को पूरी शक्ति से पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगी। मैंने भी अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और लो, वह तो पागलों की तरह मेरी चूत को चाटने और चूसने लगी।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह रेखा, ओह मेरी जान, आह्ह्ह्ह्ह्।” मैं सीत्कार निकालने को मजबूर हो गयी। रेखा मेरी चूत के अंदर जीभ डाल डाल कर पागलों की तरह चाट रही थी। मैं समझ गयी कि वह फिर से उत्तेजित हो गयी है। “आह्ह्ह्ह्ह् भगवान, तू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ भी सीख गयी आह्ह्ह्ह्ह्,” इस बार मैं थोड़ी जोर से बोली। यह सिग्नल था, दरवाजे के बाहर खड़े हरिया और करीम के लिए। पलक झपकते वे कमरे के अंदर थे।

“माल तैयार है?” हरिया बोला।

“हां हां बिल्कुल तैयार है।” मैं अपनी सांसों पर काबू पाते हुए बोली।

“कककक्या मतलब?” रेखा हड़बड़ा कर बोली।

“मतलब वतलब कुछ नहीं, तू चुदने के लिए तैयार हो जा।” मैं बोली।

“किनसे, इन बूढ़ों से?” रेखा भड़की।

“लंड लंड होता है री बुरचोदी। चुदासी चूत बूढ़े जवान लंड नहीं देखती। एक बार अनुभवी बूढ़ों से चुद कर देख, मजा न आए तो कहना।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, मैं रंडी नहीं हूं।”

“रंडी नहीं हो ना, चल आज तुझे रंडी बना ही देते हैं।” हरिया खूंखार लहजे में बोला।

“बूढ़ा बोलती है साली, अब देख हम बूढ़ों का जलवा।” करीम उसकी खूबसूरती पर लार टपकाता हुआ बोला। कुछ ही सेकेंड में दोनों नंगे हो गये। सन से सफेद झांटों से भरे दो दो आठ नौ इंच के फनफनाते मोटे लंड को देख कर रेखा तड़प कर बिस्तर से उठना चाहती थी लेकिन मेरे फौलादी बंधन से आजाद नहीं हो सकी, फड़फड़ा कर रह गयी।

“छोड़ मुझे कुतिया।” बेबसी में वह घिघियाते हुए बोली। तबतक हरिया और करीम ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था। मैं उसे उन दरिंदों के रहमोकरम पर छोड़कर हट गयी। इससे आगे कि वह कुछ और बोलती, हरिया अपना लंड उसके मुह में ठूंसने लगा। रेखा ने सख्ती से मुह बंद कर लिया था।

“मुह खोल साली कुतिया। चूस इस बूढ़े का लंड साली मां की चूत। बेबस रेखा मुह खोलने को वाध्य हो गयी। जबरदस्ती, हरिया अपना गधे सरीखा लंड उसके मुह में घुसाता चला गया। रेखा छटपटा उठी। उसका दम घुटने लगा। रेखा की स्थिति को समझ कर हरिया अपने लंड को थोड़ा बाहर खींचा। रेखा की जान में जान आई। अभी वह राहत की सांस ले ही रही थी कि तभी पुनः हरिया ने भच्चाक से लंड घुसा दिया। अपनी बेबसी और दुर्दशा से रेखा की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। दम घुटने ही वाला था, तभी फिर से हरिया ने लंड बाहर खींचा। यही क्रम कुछ देर दुहराने के बाद आश्चर्यजनक रूप से रेखा हरिया का पूरा लिंग निगलने में सक्षम हो गयी। इधर करीम रेखा की चूचियों से खेल रहा था, दबा रहा था, चूस रहा था, एक हाथ उसकी चूत पर नृत्य कर रहा था, उसके भगांकुर को दो उंगलियों से मसल रहा था। बीच बीच में करीम उसके चूत रस से सने उंगलियों को रेखा की गांड़ में भी घुसाता जा रहा था। रेखा पागल हो उठी इन हरकतों से। गों गों की आवाज आने लगी उसके लंड भरे मुह से। उसकी कमर अपने आप ऊपर नीचे होने लगी, बदन अकड़ने लगा। साफ साफ संकेत था कि उसका विरोध खत्म हो चुका था और चुदने को बेकरार हो चुकी थी। कामुकता का ज्वालामुखी फट पड़ने के कागार पर पहुंच चुका था। इसे हरिया और करीम दोनों ने महसूस कर लिया था। अब उन्हें और क्या चाहिए था, हरिया, रेखा के लार से सने, चमचमाते अपने टनटनाए ठुनकते लिंग को रेखा के मुख से निकाल कर रेखा के पैरों को फैलाया और उसकी दपदपाती योनि के प्रवेश द्वार पर रख कर एक पल रुका। उफ्फ्फ्फ, यह पल रेखा के लिए कितना असह्य था। वासना की ज्वाला में धधकती रेखा अपनी कमर को उछाल ही तो बैठी, आमंत्रण दे बैठी उस बूढ़े के लंड को, जिसे कुछ देर पहले बूढ़ा कहते हुए चुदने से इनकार कर रही थी। उस बूढ़े तोंदियल, हवस के पुजारी को और क्या चाहिए था। रेखा के चूतड़ के नीचे हाथ लगा कर उसकी क्षितिज के लंड से चुद कर फूली कुप्पा हुई चूत को ककड़ी की तरह चीरता हुआ अपना लंड उतारता चला गया।

“लेएएएएएएए, ये लेएएएएएए मेरा बूढ़ा लंड अपने बुर में। आह हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।” उस बूढ़े राक्षस का एक भीषण प्रहार था यह। एक ही वहशतनाक करारे धक्के से जड़ तक सरसरा कर ठोंक दिया था उसने और इस दर्दनाक प्रहार की पीड़ा से चीख निकल गयी रेखा की। अभी वह इस पीड़ा से संभल भी नहीं पाई थी कि हरिया अपना लंड घुसाए, रेखा को लिए दिए पलट गया, खखुद नीचे और रेखा उसके ऊपर। सख्ती से जकड़ रखा था रेखा को हरिया ने। रेखा पीड़ा से कराह रही थी लेकिन उसकी छूटने के लिए छटपटाहट को हरिया ने विफल कल दिया। तभी करीम, जो अपने लंड के लिए दूसरे छेद का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, टूट पड़ा रेखा की नुमायां होती आकर्षक गांड़ पर। अपने खतना किये हुए लंड का चमचमाता विशाल सुपाड़ा रेखा की गांड़ के छेद के पास रखा।

तभी आने वाली मुसीबत से आतंकित रेखा चीख उठी, “नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी गांड़ में नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं। इधर मेरी चूत फट रही है और उधर मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने का इरादा है क्या? नहीं प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज नहीं।” मैं नंगी भुजंगी कुर्सी पर बैठी अपने यौनांगों से खेलती हुई उस चुदाई का आनंद ले रही थी।

रेखा की चीख को नजरअंदाज करते हुए करीम एक कसाई की तरह जबर्दस्ती घुसाता चला गया अपना लंड, रेखा की संकीर्ण गुदा मार्ग में। “ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए्ए आह मेरा्आ्आ्आ्आ्आ लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ इतनी टाईट गांड़, क्षितिज का लंड खाने के बाद भी, उफ्फ्फ्फ।”

“आह्ह्ह्ह्ह् मार डाला जालिमों, हाय मेरी गां्आं्आं्आं्आंड़।” चीख उठी रेखा। दो बूढ़े भेड़ियों के बीच पिसती हुई आंसू बहाने लगी।

“बूढ़ा बोल रही थी ना कुतिया। ले हम दोनों के बूढ़े लंड, आह ओह इतनी मस्त औरत, अहा मजा आ गया अहा।” करीम बोला। “चल हरिया, शुरू हो जा।” ऐलान कर दिया करीम ने और फिर शुरू हुआ भीषण धकमपेल। उन दोनों बूढ़ों ने अपने लिए बूढ़े शब्द के लिए रेखा के शरीर को इस नृशंसता से नोचना खसोटना चालू किया कि रेखा प्रथमतः बेदम हो उठी। लेकिन कुछ समय पश्चात उन बूढ़ों के हर एक प्रहार से आनंद की सिसकारियां निकालने को वाध्य हो गयी। उनकी जालिमाना नोच खसोट से हलकान होने के बदले उनके तन से पिसती, दबती, कुचती, आनंद के सागर में गोते खाती हुई बोलने लगी, “आह ओह, चोदिए, ओह उफ्फ्फ्फ मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दीजिए मेरे बूढ़े आशिकों। ओह ऐसा मजा आह स्वर्ग का मजा।”

“वाह रेखा रानी, बन गयी आखिर तू भी रंडी। बड़ी बोल रही थी रंडी नहीं हूं मां की लौड़ी, वाह मेरे शेरों, बना डालो इसे आज रंडी, बना डालो इसे बेशरम कुतिया, इसकी सारी लाज शरम, झिझक इसकी चूत में घुसा दो, ताकि आज के बाद इसे किसी से भी चुदने में कोई झिझक न हो।” मैं रेखा को तनिक चिढ़ाती, उन चुदक्कड़ बूढ़ों को उकसाती, मजा ले रही थी तभी भूत की तरह क्षितिज कमरे में दाखिल हुआऔर कमरे के अंदर का नजारा देख कर स्तब्ध रह गया।

“ओह मॉम, तो यह चल रहा है? मुझे छोड़ कर? मुझे भूल गयी मॉम आप भी।” क्षितिज नाराजगी से बोला।

“अरे नाराज न हो बच्चे, इधर आ मेरे पास। मैं बताती हूं ऐसा क्यों हुआ। तू सीख गया बाहर की औरतों का शिकार करना, है ना?”

“हां, तो?”

“लेकिन रेखा की झिझक पूरी तरह मिटाना भी तो आवश्यक था। देखो कैसे मजे से दो दो बूढ़ों से एक साथ चुदवा रही है। है ना? यह भी सीख गयी अब पराये मर्दों से किस तरह खुल कर मजा लेना है। देखो, मैं सच कह रही हूं न?” मैं क्षितिज को समझाती हुई बोली।

“हां मॉम वो तो है।”

“फिर दुखी क्यों है? आजा बच्चे अपनी मम्मी के पास। चोद ले मुझे, मैं अभी तेरे ही बारे में सोच रही थी। खोल कपड़े और ले ले मुझे अपनी बांहों में। अपने पपलू का मिलन मेरी मुनिया से करा दे।” मेरे इतना कहने की देर थी कि सारा गिला शिकवा भूल कर फटाफट नंगा हो गया और मुझे अपनी बांहों में उठा कर चूम लिया।

“ओह माई स्वीट मॉम, आई लव यू।” इतना कहकर मेरी नग्न देह को गोद में लिए दिए उसी कुर्सी पर बैठ गया जिस पर मैं बैठी रेखा और बूढ़ों की कामलीला देख रही थी। मैं अपने दोनों पैरों से उसकी कमर को लपेटे उसकी गोद में बैठ गयी। क्षितिज मेरे होठों को चूमते हुए मेरे स्तनों से खेलने लगा। कुछ ही मिनटों में क्षितिज का लंड बमक उठा और मेरी गुदा पर दस्तक देने लगा। मैं तनिक उठ कर उसके तने हुए लिंग को अपनी चुदासी योनि के मुहाने पर स्थापित किया और बैठती चली गयी, “ओ्ओ्ओह्ह्ह्, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” एक दीर्घ निश्वास निकली मेरे मुह से। सरसराता हुआ क्षितिज का पूरा लंड मेरी चूत में समा गया।

“ओह मॉम, आह्ह्ह्।” क्षितिज मस्ती में भर गया। उसके बाद क्षितिज मेरी कमर पकड़ कर उठा उठा कर चोदने लगा और मैं खुद भी उसके लंड पर उछल उछल कर मस्ती से चुदने लगी।

“आह मेरा्आ्आ्आ्आ्आ रज्जा बेटा। ओह मां के लौड़े, ओह मां की चूत के लौड़े, ओह मादरचोद, चोद अपनी मां को आह उह आह,” मैं चुदते हुए बड़बड़ा रही थी। उधर हरिया और करीम रेखा को मशीनी अंदाज में चोदे जा रहे थे। दोनों के बीच मानो चुदाई की प्रतियोगिता चल रही थी।

“हुम साली कुत्ती, हुम साली रंडी, हुम आह, हुम मां की चूत,” हरिया और करीम एक दूसरे के पूरक बने चोदने में मगन थे। रेखा तो मानो पगला गयी थी। इतने आनंद की शायद उसने कल्पना भी नहीं की थी। दो दो मर्दों से एक साथ चुदने का यह पहला अनुभव था और क्या खूबसूरत अनुभव था। खूब मस्ती में चुदे जा रही थी। “आह मेरे चोदुओं, ओह बड़ा सुख दे रहे हो आपलोग, आह्ह्ह्ह्ह्।”

करीब तीस मिनट तक यह नंगा नाच चलता रहा। स्खलन सबका एक साथ नहीं हुआ। करीब दस दस मिनट के अंतराल में रेखा तीन बार झड़ी, क्या खूब झड़ी, मस्ती के समुंदर में डूब डूब कर झड़ी। करीब पचीस मिनट बाद हरिया झड़ने लगा। “आह्ह्ह् मेरे लौड़े का रस ओह्ह मेरे लंड का पानी्ई्ई्ई्ई्ई निकल रहा्आ्आ्आ्आ है आह।” फच्च फच्च हरिया का लंड वीर्य उगलने लगा। करीब तीस मिनट बाद करीम भी झड़ा, क्या खूब झड़ा, रेखा की देह को भींच कर आनंदय सीत्कार के साथ झड़ा। रेखा उसी वक्त तीसरी बार झड़ने लगी, “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” थक कर, तृप्त हो कर, सुखद अनुभव से दो चार होती हुई, प्रफुल्लित रेखा, चपाचप, दूध पीकर तृप्त बिल्ली की तरह हरिया और करीम डकारते हुए रेखा की कमनीय देह से चिपके निढाल हो गये।

इधर क्षितिज और मैं एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद कर रहे थे। हमारा तांडव भी करीब पचीस मिनट तक चला, फिर क्षितिज मुझे भींच कर अपना मदन रस मेरी चूत म़े भरता हुआ स्खलन के सुख में डूब गया। मैं इस दौरान दो बार स्खलित हुई। “बहुत बड़ा चुदक्कड़ हो गया रे तू। कितना मजा देना सीख गया है।” मैं नें क्षितिज को चूम लिया।

जब हम सबके सांस दुरुस्त हुए तो मैं रेखा से बोली, “आखिर बन गयी न रंडी तू।”

“हट बदमाश।” शरमा गयी।

“हाय, देखो देखो, इस रंडी को भी शरम आती है।” हा हा हा हा, सभी ठहाका मारकर हंस पड़े।

“अब बता हाल है मेरी लाड़ो रानी का?”

“मुह न खुलवा बुरचोदी। इन बुढ़ऊओं ने तो मुझे स्वर्ग ही दिखा दिया।”

“यह बोल कि स्वर्ग का द्वार खोल दिया।”

“हां हां वही।”

उसके बाद फिर एक और दौर चुदाई का चला। सवेरे देखा तो बुरी तरह नुच चुद कर रेखा की चूचियां लाल हो गयी थीं, चूत फूल कर गोलगप्पा बन गयी थी और गुदा द्वार का छल्ला फूल भी गया था और लाल भी हो गया था। कुल मिलाकर रेखा के तन का सारा कस बल निकल चुका था, मन की सारी झिझक, लाज लिहाज, शर्म, हया तार तार हो चुकी थी और अब इस दुनिया में एक नयी रेखा का अवतरण हो चुका था, बिंदास रेखा का। सवेरा एक नया सवेरा था। एक तीर से दो शिकार। क्षितिज के परस्त्रीगामी होने की की ओर अग्रसर होना और रेखा का परपुरूषों से शारीरिक सुख प्राप्त करने की कामना को जागृत करना। मैं इन दोनों प्रयासों में सफल रही।

अगली घटना, अगली कड़ी में।

तबतक के लिए इस कामुक लेखिका को आज्ञा दीजिए।

रजनी

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Rajni4u

मैं एक 51 साल की विधवा शिक्षिका हूँ। मैं कामोत्तेजक कहानियां पढ़ना, दोस्ती करना और दोस्तों से किसी भी प्रकार की चैटिंग करना पसंद करती हूं। मेरी रुचि संगीत में भी है। फिलहाल मैं अपनी कामुक भावनाओं को कहानियों के माध्यम से लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं।